छट्ठठ्ठमदसमदुबालसेहिं अण्णाणियस्स जा सोही ।
तत्तो बहुगुणदरिया होज्ज हु जिमिदस्स णाणिस्स ॥111॥
चार-पाँच उपवासों से हो जो विशुद्धि अज्ञानी को ।
उससे भी कई गुणी विशुद्धि भोजन करते ज्ञानी को॥111॥
अन्वयार्थ : अज्ञानी के वेला, तेला तथा चार उपवास, पाँच उपवास इत्यादि तप करने पर जो शुद्धता होती है, उससे भी बहुत गुणी शुद्धता भोजन करते हुए भी सम्यग्ज्ञानी के होती है ।

  सदासुखदासजी