+ स्वाध्याय से गुप्ति होती है, यह कहते हैं - -
सज्झायभावणाए य भाविदा होंति सव्वगुत्तीओ ।
गुत्तीहिं भाविदाहिं य मरणे आराधओ होदि ॥112॥
स्वाध्याय में तत्परता से सर्व गुप्तियाँ भावित हों ।
मरण समय में गुप्ति भाव से रत्नत्रय आराधन हो॥112॥
अन्वयार्थ : स्वाध्यायरूप भावना करके, कर्म के आगमन के कारण मन-वचन-काय के व्यापार के अभाव से तीन प्रकार की गुप्तियाँ होती हैं । गुप्ति होने से मरण समय में आराधना निर्विघ्न होती है, इसलिए स्वाध्याय ही आराधना का प्रधान कारण है । यहाँ विशेषता यह है कि जो स्वाध्याय भावना में रत होता है, वही पर जीवों को उपेदश देने वाला होता है, अन्य कोई पर के उपकार करने में समर्थ नहीं ।

  सदासुखदासजी