
आदपरसमुद्धारो आणा वच्छल्लदीवणा भत्ती ।
होदि परदेसगत्ते अव्वोच्छित्ती य तित्थस्स॥113॥
निज-पर का उद्धार, आज्ञा1, प्रवचन वत्सलता भक्ति ।
गुण-वृद्धि, धर्माेपदेश अरु तीर्थ अव्युच्छित्ति होती॥113॥
अन्वयार्थ : भव्यजनों को सत्यार्थ धर्म का उपदेश देने से अपने को तथा अन्य श्रोताजनों को संसार से भयभीतपना होता है और परमधर्म में प्रवर्तन करने से संसार-परिभ्रमण का अभाव होता है । इसलिए स्व-पर का उद्धार जिनवचन के उपदेश से ही होता है तथा जिनेन्द्र के आगम का उपदेश अपने आत्मा को और अन्य जीवों को करने से भगवान की आज्ञा का पालन होता है । जिसे जिनेन्द्र के धर्म में अति प्रीति होती है, वही निर्वांछक अभिमान रहित होकर धर्मोपदेश करता है, अत: उसे वात्सल्य गुण भी प्रगट होता है और जिसे जिनेन्द्र के धर्म का उपदेश देकर धर्म का प्रभाव प्रगट करने में उत्साह हो, उसे आत्मगुण बढाने की वांछा होती है, उसके प्रभावना नामक गुण भी होता ही है ।
जिसके स्याद्वादरूप परमागम में अति प्रीति हो, उसके धर्म का उपदेशकपना होता है । इससे भक्ति गुण भी प्रगट होता है तथा परमागम के सत्यार्थ उपदेश से धर्मतीर्थ की अव्युच्छित्ति होती है, परिपाटी नहीं टूटती है, सभी जन धर्म का स्वरूप जानते रहते हैं या बहुत कालपर्यंत धर्म की संतान/संतति वर्तती रहती है । इसलिए स्व और पर का उद्धार भगवान की आज्ञा का पालना, वात्सल्य-प्रभावना-भक्ति तथा धर्मतीर्थ की अव्युच्छित्ति, धर्मोपदेश के दातापने को जानकर आगम की आज्ञा प्रमाण धर्मोपदेश में प्रवर्तन करना - यह ही परम कल्याण है ।
इति सविचार भक्तप्रत्याख्यानमरण के चालीस अधिकारों में शिक्षा नामक तीसरे अधिकार का व्याख्यान त्रयोदश गाथासूत्रों में पूर्ण किया ।
आगे विनय नामक चौथा अधिकार तेईस गाथाओं द्वारा कहते हैं । इसलिए लिंग ग्रहण के अनन्तर ज्ञान की समाप्ति करने योग्य है और ज्ञान-सम्पदा में प्रवर्तते पुरुष को विनय का आचरण करने योग्य है ।
सदासुखदासजी