
काले विणये उवधाणे बहुमाणे तहे व णिण्हवणे ।
वंजण अत्थ तदुभये विणओ णाणम्मि अट्ठविहो ॥115॥
काल, विनय, उपधान और बहुमान तथा निह्नव जानो ।
व्यंजन अर्थ-उभय शुद्धि ये ज्ञान-विनय के भेद गहो॥115॥
अन्वयार्थ : संध्याकाल तथा सूर्य-चन्द्रादि के ग्रहण काल, उल्का-पातादि के काल को छोडकर सूत्र का अध्ययन करना, वह काल नामक ज्ञान विनय है । श्रुत या श्रुत के धारकों का स्तवन करना, गुणों में अनुराग करना, वह विनय नामक ज्ञान विनयहै । जितने काल तक इस सूत्र सिद्धान्त का श्रवण या पठन पूर्ण नहीं होगा, तब तक के लिये मैं ये वस्तु नहीं खाऊँगा या
सदासुखदासजी