
उवगूहणमादिया पुव्वुत्ता तह भत्तियादिया य गुणा ।
संकादिवज्जणं पि य णेओ सम्मत्तविणओ सो॥116॥
पूर्वकथित उपगूहन आदिक भक्ति आदि गुण भी जानो ।
शंकादिक दोषों का हो परिहार विनय-समकित मानो॥116॥
अन्वयार्थ : पर का दोष ढकना और अपनी प्रशंसा नहीं करना उपगूहन गुण है । अपने आत्मा को या पर को धर्म में निश्चल करना स्थितिकरण गुण है । धर्मात्मा में या रत्नत्रय धर्म में प्रीति करना यह वात्सल्य गुण है । पूर्व में कहे जो अरहंतादि में भक्ति, पूजा तथा अरंहतादिकों के उज्ज्वल गुणों के यश का प्रकाशन करना वर्णजनन गुण है । अवर्णवाद - दुष्टों द्वारा लगाये गये दोष, उनका विनाश करना और विराधना का त्याग इत्यादि पूर्व कथित भक्ति आदि गुण के द्वारा प्रभावना करना तथा आप्त, आगम, पदार्थ में शंका का वर्जन करना तथा इह लोकप र लोक संबंधी विषयों की कांक्षा-वांछा का परित्याग करना तथा रोगी, दु:खी, दरिद्री, वृद्ध, मलिन, चेतन-अचेतन पदार्थ में ग्लानि का त्याग करना तथा मिथ्याधर्म की प्रशंसा नहीं करना । इसप्रकार अष्ट अंगों को दृढता पूर्वक अंगीकार करना, यह दर्शन विनय है ।
सदासुखदासजी