+ आगे चार गाथाओं में चारित्र विनय को कहते हैं- -
इंदियकसायपणिधाणं पि य गुत्तीओ चेव समिदीओ ।
एसो चरित्तविणओ समासदो होइ णायव्वो॥117॥
इन्द्रिय और कषाय रूप परिणति नहिं होना आतम की ।
गुप्ति समिति को भी जानो चारित्र-विनय संक्षेप यही॥117॥

  सदासुखदासजी