पं-सदासुखदासजी
सद्दरसरूवगंधे फासे य मणोहरे य इदरे य ।
जं रागदोसगमणं पंचविहं होदि पणिधाणं॥119॥
शब्द-रूप-रस-गन्ध तथा स्पर्श-मनोहर और इतर ।
इनमें हो जो राग-द्वेष इन्द्रिय प्रणिधान पाँच प्रकार॥119॥
सदासुखदासजी