णोइंदियपणिधाणं कोधो माणो तहेव माया य ।
लोभो य णोकसाया मणपणिधाण तु तं वज्जे॥120॥
नोइन्द्रिय प्रणिधान जानिये क्रोध मान माया अरु लोभ ।
नोकषाय हास्यादिक इनमें मन प्रणिधान छोड़ने योग्य॥120॥
अन्वयार्थ : इन्द्रिय और कषाय इनमें जो अप्रणिधान, परिणति को प्राप्त नहीं होना और मन-वचनक ाय की प्रवृत्ति को रोकना, गुप्ति धारण करना तथा सम्यक् यत्नाचार रूप प्रवृत्ति, समिति पालना, यह संक्षेप से चारित्र विनय जानना । प्रणिधान/संसारी जीवों की प्रवृत्ति दो प्रकार की है - एक इन्द्रिय द्वारा इन्द्रियरूप है, एक मन द्वारा नोइन्द्रियरूप है । उसमें से इन्द्रिय द्वारा प्रवृत्ति तो इन्द्रियों के विषय जो शब्दादि उनमें होती है, मन द्वारा प्रवृत्ति क्रोधादिरूप होती है । मनोहर-अमनोहर ऐसे शब्द, रस, गंध, रूप, स्पर्श जो इन्द्रियों के विषय, उनमें से जो मनोहर हैं; उनमें राग करना, अमनोहर में द्वेष करना, ऐसा यह इन्द्रिय प्रणिधान पाँच प्रकार का है ।

  सदासुखदासजी