पं-सदासुखदासजी
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आगे तपोविनय का निरूपण दो गाथाओंे द्वारा कहते हैं -
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उत्तरगुणउज्जमणे सम्मं अधिआसणं च सढ्ढाय ।
आवासयाणमुचिदाण अपरिहाणी अणुस्सेओ॥121॥
उत्तर गुण में उद्यम, समताभाव और तप में आदर ।
षट्-आवश्यक के पालन में हीनाधिक नहिं हो आचार॥121॥
सदासुखदासजी