
भत्ती तवोधिगंमि य तवम्मि य अहीलणा य सेसाणं ।
एसो तवम्मि विणओ जहुत्तचारिस्स साहुस्स॥122॥
तप में अधिक साधु की भक्ति, नहीं अनादर अल्पतपी1 ।
इसे कहा चारित्र-विनय है श्रुत-आराधक साधु की॥122॥
अन्वयार्थ : उत्तर गुणों में उद्यम तथा क्षुधादि परीषहों को सम्यक्, समभावों से सहना, तपश्चरण में श्रद्धान करना; उचित जो षट् आवश्यक, उनमें हीनता नहीं करना और उद्धतता का अभाव करना एवं तप में जो न्यून, हीन हों तथा तपश्चरण रहित हों; उनका तिरस्कार, अवज्ञा अपमान नहीं करना, यह तप विनय है । यह यथोक्त आचारांग की आज्ञाप्रमाण आचरण करने वाले साधु के होती है ।
सदासुखदासजी