इच्चेवमादिविणओ जो उवयारो कीरदे सरीरेण ।
एसो काइयविणओ जहारिहो साहुवग्गम्मि॥127॥
इसप्रकार निज तन से करना साधुजनों का जो उपचार ।
यथायोग्य सब क्रिया जानना शारीरिक विनय उपचार॥127॥
अन्वयार्थ : महान मुनि यदि संघ में आवें/पधारें तो उठकर खडे होना और सन्मुख गमन करना अर्थात् सन्मुख जाना, बाद में कृतिकर्म जो भक्ति, वंदना के पाठ पढना, फिर नमस्कार करना, अंजुली (हाथ जोडकर) मस्तक चढाना और उनका गमन हो तो पीछे-पीछे चलना, गुरुजनों के खडे रहने पर (स्वयं को) अभिमान रहित खडे होना, गुरुजन से नीचा आसन करना, बैठना । जिस तरह अपने हस्त-पाद-श्वासादिक से गुरुजनों को उपद्रव/तकलीफ न हो, इस तरह बैठना तथा अग्र भाग में सन्मुख आसन को छोडकर वामे, पसोडे/बायीं ओर उद्धतता रहित थोडा मस्तक नमाकर बैठना तथा गुरुजनों का आसन यदि काष्ठमय, पाषाणमय फलक/ सिंहासन हो या शिला-तल पर बैठे हों तो अपने को भूमि पर बैठना तथा गमन करते समय गुरुजनों के पीछे चलना या बायीं ओर उद्धतता रहित गमन करना और गुरुजनों के नाभिप्रमाण (कमर से नीचे) पृथ्वी में अपना मस्तक हो, ऐसे शयन (सोना) करना, अपने हस्त-पाद आदि द्वारा गुरुजनों को तकलीफ न पहुँचे - ऐसे शयन करना, अपने अधो अंग का भी स्पर्श न हो, ऐसे शयन करना ।

  सदासुखदासजी