
उवतसंतवयणमगहित्थवयणमकिरियमहीलणं वयणं ।
एसो वाइयविणओ जहारिहो होदि कादव्वो॥129॥
वचन न बोले योग्य गृहस्थों के1 बोले उपशान्त वचन ।
क्रिया-विहीन अवज्ञा-हीन वचन बोले यह विनय-वचन॥129॥
अन्वयार्थ : यदि गुरुओं से वचनालाप करना हो तो इस प्रकार करना - हे भट्टारक! आपने जो आज्ञा की, उसे आनन्द पूर्वक ग्रहण करता हूँ या हे भगवन्! आपके चरणारविंदों की आज्ञा के प्रसाद से यह कार्य करने की इच्छा करता हूँ तथा हे स्वामिन्! आपका वचन प्रमाण है, इत्यादि पूजा-वचन, आदर-वचन बोलना और गुरुजनों के दोनों लोकसंबंधी हितरूप विनती करना, यह हित-भाषण है ।
सदासुखदासजी