
पापविसोत्तिय परिणामवज्जणं पियहिदे य परिणामे ।
णायव्वो संखेवेण एसो माणस्सिओ विणओ॥130॥
पापों को उत्पन्न करे एेसे न कभी भी होंे परिणाम ।
प्रिय अरु हित में हों सलग्न परिणाम यही मनविनय सुजान॥130॥
अन्वयार्थ : जिस परिणाम से अपने को पाप का प्रवाह आस्रव हो, ऐसा परिणाम "गुरु जो साधु/मुनिजन उनको" नहीं बोलना, यह पापविश्रोतक परिणाम वर्जन है । ये गुरु हमारे आचरण
सदासुखदासजी