+ आगे गुरुजनों की ही विनय करना, अन्य की नहीं करना - ऐसा नियम नहीं है, उनकी भी विनय करना - यह कहते हैं - -
राइणिय अराइणीएसु अज्जासु चेव गिहिवग्गे ।
विणओ जहारिहो सो कायव्वो अप्पमत्तेण॥132॥
रत्नत्रय में हीनाधिक हों तथा आर्यिका और गृहस्थ ।
यथायोग्य कर्त्तव्य विनय है उनकी भी होकर अप्रमत्त॥132॥
अन्वयार्थ : जिसे दीक्षा लिये एक रात्रि भी अधिक हो, उसे रात्रि-अधिक कहते हैं और

  सदासुखदासजी