
चालणिगयं व उदयं सामण्णं गलइ अणिहुदमणस्स ।
कायेण य वायाए जदवि जधुत्तं चरदि भिक्खू॥138॥
चलनी में जलवत् गल जाता जिसका होता चंचल चित्त ।
यद्यपि देह-वचन से भिक्षु आगमोक्त पाले चारित्र॥138॥
अन्वयार्थ : जिसका मन वशीभूत नहीं, ऐसा साधु आचारांग की आज्ञाप्रमाण यथावत् काय से या वचन से सत्यार्थ चारित्र पालता है तो भी मन के वशीभूतपने के बिना उसका चारित्र, जैसे चलनी में रखा गया जल नहीं ठहरता, तैसे ही विनाश को प्राप्त हो जाता है, इसलिए मन की निश्चलता करना ही उचित है ।
सदासुखदासजी