अंधलयबहिरमूगोव्व मणो लहुमेव विप्पणासेइ ।
दुक्खो य पडिणियत्ते दुं जो गिरिसरिदसोदं वा॥140॥
अन्धे-बहरे-गूँगे जैसा मन विनष्ट हो जाता शीघ्र ।
उसे रोकना बहुत कठिन, ज्यों गिरि पर बहती हुई नदी॥140॥

  सदासुखदासजी