पं-सदासुखदासजी
तत्तो दुक्खे पंथे पाडेदुं दुद्धओ जहा अस्सो ।
वीलणमच्छोव्व मणो णिग्घेत्तुं दुक्करो धणिदं॥141॥
दुष्ट अश्ववत् विषम मार्ग में पतन कराता है यह मन ।
अतिचिकनी मछलीसम दुष्कर अनुशासित करना यह मन॥141॥
सदासुखदासजी