पं-सदासुखदासजी
जस्स य कदेण जीवा संसारमणंतयं परिभमंति ।
भीमासुहगदिबहुलं दुक्खसहस्साणि पावंता॥142॥
इस मन की चेष्टा से जीव सदैव हजारों दुःख भोगे ।
महा भयानक अशुभ गति में यह अनन्त परिभ्रमण करे॥142॥
सदासुखदासजी