
जम्हि य वारिदमेत्ते सव्वे संसारकारया दोसा ।
णासंति रागदोसादिया हु सज्जो मणुस्सस्स॥143॥
इसे नियन्त्रित करने से ही सब संसारोत्पादक दोष ।
शीघ्र नष्ट हो जाते नर के मोह-राग-द्वेषादिक दोष॥143॥
अन्वयार्थ : जैसे वायु का बबूला दौडता है, वैसे ही आत्मस्वरूप से चलायमान यह मन भी सर्व पृथ्वी में, विषयों में, जल में, स्थल में, नगर में, ग्राम में, पर्वत में, समुद्र में, वन में, आकाश में, दिशा में, धन में, भोजन में, पात्र में, वस्त्र में, मित्र में, शत्रु में, होती हुई वस्तु में, नहीं होने वाली वस्तु में, जीवन में, मरण में, हार में, जीत में, सब तरफ बेरोक/बिना रोक-टोक के भ्रमता है और जैसे पुद्गल परमाणु द्रव्य एक समय में चौदह राजू जाता है, तैसे ही स्वछन्द यह मन भी दूर क्षेत्रवर्ती, निकट क्षेत्रवर्ती सर्व पदार्थ में शीघ्रता से जाता है तथा जैसे अंधा देखता नहीं, बहरा सुनता नहीं, गूँगा बोलता नहीं; वैसे ही यह मन विषय में आसक्त हो जाये तो नेत्रादि पाँचों इन्द्रियाँ भी अपने निकटवर्ती विषयों को भी देखती नहीं, सुनती नहीं, बोलती नहीं, सँूघती नहीं, स्पर्शर्ती नहीं, तब चारित्र में कैसे मन लगे?
जैसे पर्वत से गिरता नदी का प्रवाह बहुत कष्टपूर्वक प्रयत्न करने पर भी नहीं रुकता, वैसे ही संयम से गिरा यह मन भी राग-द्वेष कामादि में चलायमान हुआ बहुत कष्ट करने पर भी रोका रुकता नहीं है, जैसे दुष्ट घोडा असवार को जैसे दु:ख हो, ऐसे विषम मार्ग में पटकता है; वैसे ही यह दुष्ट मन भी आत्मा को अनन्तानन्त काल तक दु:ख हो, ऐसे मिथ्यात्व-असंयम कषायों में पटकता हैतथा जैसे बीलण जाति के मत्स्य को पकडने में, रोकने में व्यक्ति असमर्थ है; वैसे ही इस बिगडे हुए मन को रोकने में असमर्थ है । इस दुष्ट मन की चेष्टा करके ही यह जीव अनंतानंत भयानक नरक-निगोदादि अशुभ गति की है अधिकता जिसमें, ऐसे संसार में जन्म, मरण, क्षुधा, तृषादि हजारों दु:खों को प्राप्त होता हुआ परिभ्रमण करता है और इस मन को स्वाध्याय, शुभध्यान, द्वादश भावना - इनमें रोकने से ये संसार परिभ्रमण कराने वाले राग-द्वेषादि दोष शीघ्र ही नाश को प्राप्त हो जाते हैं ।
सदासुखदासजी