
इय दुठ्ठयं मणं जो वारेदि पडिठ्ठवेदि य अकंपं ।
सुहसंकप्पपयारं च कुणदि सज्झायसण्णिहिदं॥144॥
दुष्ट चित्त को करे निवारित, निश्चल अरु निष्कम्प करे ।
स्वाध्याय शुभ संकल्पों में उसको समता भाव घटे॥144॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार जो दुष्ट मन को रोककर श्रद्धान रूप परिणामों में निश्चल स्थापन करते हैं, उसके ही शुभ संकल्प होता है, वही आत्मा को स्वाध्याय में तत्पर करता है/लीन होता है ।
सदासुखदासजी