
जो वियविणिप्पडंतं मणं णियत्तेदि सह विचारेण ।
णिग्गहदि य मणं जो करेदि अदिलज्जियं च मणं॥145॥
बाह्य विषय में गिरते मन को सुविचारों द्वारा रोके ।
निन्दा अरु लज्जित करता जो उसको श्रमणपना होवे॥145॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष बाह्य विषय-कषायों में भ्रमने वाले मन को अध्यात्म भावना, द्वादश भावना एवं धर्मध्यान द्वारा रोकता है, वही मन का निग्रह करता है तथा मन को अति लज्जित करता है ।
सदासुखदासजी