
दासं व मणं अवसंसवसं जो कुणदि तस्स सामण्णं ।
होदि समाहिदमविसोत्तियं च जिणसासणाणुगदं॥146॥
अवश चित्त को सुवश दासवत् जो अपने वश में करता ।
उसे समाहित1 पाप रहित जिनशासनोक्त श्रामण्य हुआ॥146॥
अन्वयार्थ : जो जिनेन्द्र के आगम का अनुभव करके तथा सत्यार्थ आत्मिक सुख का अनुभव करके अ-वश मन को दासीपुत्र की तरह स्ववश अर्थात् अपने वशीभूत करता है, उन्हीं के पापास्रव रहित जिनशासन के अनुकूल आत्महित में लीनता रूप मुनिपना होता है ।
सदासुखदासजी