
दंसणसोधी ठिदिकरणभावणा अदिसयत्तकुसलत्तं ।
खेत्तपरिमग्गणावि य अणियदवासे गुणा होंति॥147॥
दर्शविशुद्धि, स्थितिकरण, भावना, अतिशय अर्थ प्रवीण ।
क्षेत्रान्वेषण ये पाँचों गुण हो अनियत विहार में ही॥147॥
अन्वयार्थ : यतिजनों को एक स्थान में नहीं रहना, अनेक देशों में विहार करना - इसका नाम अनियत विहार है । इस अनियत विहार में इतने गुण प्रगट होते हैं - दर्शन की शुद्धता, स्थितिकरण, भावना, अतिशयार्थ कुशलता तथा क्षेत्रपरिमार्गणा ।
सदासुखदासजी