+ आगे अनियतविहार नामक छठवाँ अधिकार बारह गाथाओं द्वारा कहते हैं- -
दंसणसोधी ठिदिकरणभावणा अदिसयत्तकुसलत्तं ।
खेत्तपरिमग्गणावि य अणियदवासे गुणा होंति॥147॥
दर्शविशुद्धि, स्थितिकरण, भावना, अतिशय अर्थ प्रवीण ।
क्षेत्रान्वेषण ये पाँचों गुण हो अनियत विहार में ही॥147॥
अन्वयार्थ : यतिजनों को एक स्थान में नहीं रहना, अनेक देशों में विहार करना - इसका नाम अनियत विहार है । इस अनियत विहार में इतने गुण प्रगट होते हैं - (1) दर्शन की शुद्धता, (2) स्थितिकरण, (3) भावना, (4) अतिशयार्थ कुशलता तथा (5) क्षेत्रपरिमार्गणा ।

  सदासुखदासजी