+ आगे दर्शन विशुद्धि गुण कहते हैं- -
जम्मण-अभिणिक्खवणंणाणुप्पत्ती य तित्थणिसिहीओ ।
पासंतस्स जिणाणं सुविसुद्धं दंसणं होदि ॥148॥
जन्म स्थल तप ज्ञानोत्पत्ति समवसरण श्री जिनवर का ।
मान-स्तम्भ निषिधका1-दर्शन से समकित निर्मल होता॥148॥
अन्वयार्थ : अनेक देशों में विहार करने से जिनेन्द्र भगवान के जन्म कल्याणक की भूमि, तपकल्याणक की भूमि, ज्ञानकल्याणक की भूमि तथा समवशरण का स्थान - उनके अवलोकन से तथा ध्यान के स्थानों के अवलोकन से निर्मल सम्यग्दर्शन होता है- इति दर्शनविशुद्धिह्न ।

  सदासुखदासजी