+ स्थितिकरण गुण प्रगट करते हैं - -
संविग्गं संविग्गाणं जणयदि सुविहिदो सुविहिदाणं ।
जुत्तो आउत्ताणं विसुद्धलेस्सो सुलेस्साणं॥149॥
तप, चारित्र विशुद्ध लेश्यायुत मुनियों का अनियतवास ।
लखकर चारित तप लेश्यायुत मुनि को होता है संवेग॥149॥
अन्वयार्थ : उत्तम है चारित्र जिनका, ऐसे साधुओं का अनेक देशों में विहार करना कैसा है? जब वैरागी अन्य साधुजनों को अतिशयरूप संसार-देह-भोगों से विरक्ति उत्पन्न होती है, तब इनका सत्यार्थ वीतरागपना देखकर हजारों जन वैराग्य को प्राप्त होते हैं तो अन्य संयमीजनों की विरक्ति वृद्धि को प्राप्त नहीं होगी क्या? बढेगी ही तथा उत्तम चारित्र के धारकों के चारित्र में अति उत्साह प्रगट करते हैं, योग्य आचरण के धारकों को तप में युक्त करते हैं और उज्ज्वल लेश्या के धारकों की लेश्याओं में अति उज्ज्वलता उत्पन्न करते हैं ।

  सदासुखदासजी