+ आगे नाना देशों में विहार करने के और भी गुण कहते हैं - -
पियधम्मवज्जभीरु सुत्तत्थविसारदो असढभावो ।
संवेग्गाविदि य परं साधू णियदं विहरमाणो॥150॥
क्षमा आदि धमाब का धारक, पापभीरु अरु सूत्र-निपुण ।
अनियतवासी अशठ साधु उत्पन्न करें पर को1 संवेग॥150॥
अन्वयार्थ : सदाकाल विहार करने वाले अन्य लोगों को धर्मानुरागरूप - वीतरागरूप करते हैं । कैसे हैं साधु? अत्यन्त प्रिय है दशलक्षण धर्म जिसको ऐसे हैं । पाप से अत्यन्त भयभीत, सूत्र के अर्थ में प्रवीण और मूर्खतारहित - ऐसे साधु अनेक देशों में विहार करने वाले अनेक देशों के प्राणियों की धर्म में प्रीति कराते ही कराते हैं । इस प्रकार पर जीवों को स्थितिकरण करने रूप गुण कहा ।

  सदासुखदासजी