
संविग्गदरे पासिय पियधम्मदरे अवज्जभीरुदरे ।
संयमवि पियथिरधम्मो साधू विहरंतओ होदि॥151॥
संवेगी प्रिय धर्मलीन अरु पाप-भीरु मुनिगण को देख ।
अनियतवासी साधु स्वयं भी उन जैसा गुणवान बने॥151॥
अन्वयार्थ : अनेक देशों में विहार करने से संसार-देह-भोगों से विरक्त देखने से धर्मप्रिय धर्मानुरागियों को देखने से, पाप-भीरु दुराचरण रहित जीवों को देखने से, साधु संयमी स्वयं भी प्रीति युक्त तथा धर्म में स्थिर निश्चल अनियत विहार करने वाले होते हैं । इसप्रकार अनियत विहार करने से स्थितिकरण गुण कहा ।
सदासुखदासजी