+ आगे अनेक देशों में विहार करने से परीषह सहनरूप भावना होती है, वही कहते हैं- -
चरिया छुहा य तण्हा सीदं उण्हं च भाविदं होदि ।
सेज्जा वि अपडिबद्धा य विहरणेणाधिआसिया होदि॥152॥
चर्या क्षुधा तृषा शीतोष्ण परीषह हों संक्लेश विहीन ।
अनियतवासी मुनि को होते और वसति भी ममता हीन॥152॥
अन्वयार्थ : तीक्ष्ण, शर्करा, पाषाण, कंकरी, काँटा, शीत-उष्ण तथा कर्कश भूमि - इन पर पादत्राण रहित (चप्पल-खडाऊँ आदि के बिना) चरणों से गमन तथा मार्ग में चलने से उत्पन्न हुई वेदना, उसे संक्लेशभाव रहित सहना चर्याभावना है अर्थात् मार्ग से उत्पन्न परीषह को सम-भावों से सहना । पूर्व में नहीं किया है, परिचय जिनसे ऐसे देशों में विहार तथा उन देशों में भोजन नहीं मिलना या अन्तराय हो जाना, उनसे उत्पन्न क्षुधा की वेदना को संक्लेश रहित सहना, यह क्षुधा-परीषह सहन है और ग्रीष्मॠतु में विहार करना, प्रकृति विरुद्ध आहार करना तथा उपवासों के पारणा में थोडे जल का लाभ होना अथवा जल नहीं मिलना, इत्यादि से उत्पन्न तृषा-परीषह को समभावों से सहना । शीत-उष्ण परीषह को समभावों से सहना ।
कर्कश-कठोर, कँकरी, ठीकरी, कंटक, कठोर तृण - इन सहित भूमि तथा शीत भूमि, उष्ण भूमि, विषम - ऊँची-नीची भूमि पर एक करवट से अंग को संकोच कर सोना - इसप्रकार शय्या जनित परीषह समभावों से सहना या शय्या/वसतिका में अप्रतिबद्ध अर्थात् "यह वसतिका हमारी है"- इसप्रकार के ममताभाव रहित होना । इन सभी परीषहों को सहना अनेक देशों में विहार करने से होता है । इति भावना । इसप्रकार अनियत विहार में भावना गुण कहा ।

  सदासुखदासजी