+ अनेक देशों में विहार करने से अतिशयरूप अर्थ में प्रवीणता -
णाणादेसे कुसलो णाणादेसे गदाण सत्थाणं ।
अभिलाव अत्थकुसलो होदि य देसप्पवेसेण॥153॥
नाना देश-विहारी होता बहु-देशी सम्बन्ध कुशल ।
और वहाँ उपलब्ध शास्त्र के शब्दाथाब में बने कुशल॥153॥
अन्वयार्थ : नवीन-नवीन देशों में विहार करने से अनेक देशों का आचरण देशों की रीति तथा चारित्र पालने की योग्यता वा अयोग्यता का ज्ञान होता है । अनेक देशों में प्राप्त हुए शास्त्रों में, वहाँ की भाषा तथा अर्थ में प्रवीणता प्राप्त होती है ।

  सदासुखदासजी