+ आगे अतिशय रूप अर्थ में कुशलता नामक गुण कहते हैं- -
सुत्तत्थथिरीकरणं अदिसयिदत्थाण होदि उवलद्धी ।
आयरियदंसणेण दु तह्मा सेवेज्ज आयरियं॥154॥
आचायाब के दर्शन से ही सूत्र-अर्थ में दृढ़ता हो ।
उपलब्धि अतिशय अथाब की इसीलिए गुरु-सेवा हो॥154॥
अन्वयार्थ : अनेक देशों में विहार करने से आचार्य का सेवन (अर्थात् सेवा-उपासना आदि का लाभ) प्राप्त होता है ।

  सदासुखदासजी