
णिक्खवणपवेसादिसु आयरियाणं बहुप्पयाराणं ।
सामाचारीकुसलो य होदि गणसंपवेसेण॥155॥
बहुविध आचायाब के गुण में जो मुनिराज प्रवेश करें ।
सामाचारी1 तथा निष्क्रमण2 अरु प्रवेश में कुशल बनें॥155॥
अन्वयार्थ : बहुत प्रकार के आचार्य के संघ में प्रवेश करने से, संघ में जाने से निष्क्रमण प्रवेशादि क्रिया में समाचारी प्रवीण होता है ।
सदासुखदासजी