
कंठगदेहिं वि पाणेहिं साहूणा आगमो हु कादव्वो ।
सुत्तस्स य अत्थस्स य सामाचारी जध तहेव॥156॥
जैसे सूत्र अर्थ अरु सामाचारी का अभ्यास करें ।
वैसे प्राण कण्ठगत हों फिर भी आगम अभ्यास करें॥156॥
अन्वयार्थ : कंठ-गत प्राण होने पर भी साधु को आगम पढना-सीखना उचित है । जैसे सूत्र के अर्थ का समाचारी हो, वैसे आगम की ही आराधना करना ।
इस प्रकार अनियत-विहार नामक छठवें अधिकार में अतिशयार्थ कुशलपना चार गाथाओं द्वारा दिखाया ।
सदासुखदासजी