
संजदजणस्स य जहिं फासुविहारो य सुलभवुत्ती य ।
तं खेत्तं विहरंतो णाहिदि सल्लेहणाजोग्गं॥157॥
जहाँ संयमी का होता प्रासुक विहार एवं आहार ।
सल्लेखना सुयोग्य जानता, देशान्तर में करें विहार॥157॥
अन्वयार्थ : देशांतर में विहार करने वाला जो साधु, वह जिस देश में जीव बाधा रहित, बहुत जल, कर्दम, हरित अंकुर, त्रस रहित - ऐसे क्षेत्र मंंंे मुनियों का प्रासुक विहार जीव बाधा रहित गमन करने योग्य हो, उस क्षेत्र को जाने तथा जिस देश में साधु को आहार-पानी मिलना सुलभ हो तथा शीत-उष्णादि की बाधा रहित अपनी या पर की सल्लेखना के योग्य क्षेत्र हो, उसे जानेगा अत: अनियत विहार योग्य है ।
सदासुखदासजी