
वसधीसु य उवधीसु य गामे णयरे गणे य सण्णिजणे ।
सव्वत्थ अपडिबद्धो समासदो अणियदविहारो॥158॥
ग्राम नगर संघ श्रावकजन, उपकरण वसतिका में सर्वत्र ।
यह मेरा इस भाव रहित जो साधु विहारी-अनियत है॥158॥
अन्वयार्थ : वसतिका में, उपकरण में, ग्राम में, नगर में, संघ में, श्रावकों में, ममता के बन्धन को प्राप्त नहीं हो, उसके अनियत विहार होता है । यह वसतिका हमारी है, मैं इसका स्वामी हूँ
सदासुखदासजी