
अणुपालिदो य दीहो परियाओ वायणा य मे दिण्णा ।
णिप्पादिदा य सिस्सा सेयं खलु अप्पणो कादुं॥159॥
दर्शन ज्ञान चरित तप का आचरण किया मैंने चिरकाल ।
करी वाचना शिष्य पढ़ाये अब करना अपना कल्याण॥159॥
अन्वयार्थ : मैंने बहुत काल तक पर्याय की ही सँभाल की, रक्षा की । कैसी पर्याय? दर्शन, ज्ञान,
सदासुखदासजी