
किण्णु अधालंदविधी भत्तपइण्णेंगिणी य परिहारो ।
पादोवगमणजिणकप्पियं च विहरामि पडिवण्णो॥160॥
अथालन्द विधि भक्तप्रतिज्ञा इंगिनीमरण विशुद्धिपरिहार ।
प्रायोपगमन या जिनकल्पी विधि धारणकर मैं करूँ विहार॥160॥
अन्वयार्थ : तो क्या करना? भक्तप्रतिज्ञा तथा इंगिनी एवं प्रायोपगमन नामक जिन-कल्पित मरण की विधि को प्राप्त करके प्रवर्तन करूँगा ।
सदासुखदासजी