
जइ कहवि कसायग्गी समुठ्ठिदो होज्जा विज्झवेदव्वो ।
रागद्दोसुप्पत्ती विज्झादि हु परिहरंतस्स॥268॥
यदि किंचित् भी हो उत्पन्न कषाय अग्नि तो करना शान्त ।
जो कषाय को जीते उसके राग-द्वेष भी होते शान्त॥268॥
अन्वयार्थ : यदि कदाचित् कषायरूप अग्नि प्रज्वलित हो तो कषाय से उत्पन्न दोष, उनकी भावना से कषाय-अग्नि को बुझाना योग्य है । वही कहते हैं - हमारे हृदय में उत्पन्न कषायरूप अग्नि नीच पुरुषों की संगति की तरह हृदय को दग्ध करती है । जैसे अशुभ अंगोपांग नामकर्म मुख को विरूप करता है, वैसे ही कषाय मुख को विरूप - भयंकररूप करती है तथा जैसे धूल नेत्रों को लाल कर देती है, वैसे ही कषायें नेत्रों को लाल करती हैं और वायु की तरह शरीर को कंपायमान करती हैं । कषायें मदिरापान की तरह विचार रहित वचन कहलाती हैं, पिशाच की तरह विचार रहित चेष्टा कराती हैं, ज्ञानरूप दिव्य नेत्र को मलिन करती हैं, दर्शनरूप कल्प-वृक्ष के वन को मूल से उखाडती हैं और चारित्ररूप सरोवर का शोषण करती हैं । तप रूप पल्लव को भस्म करती हैं, अशुभ प्रकृतिरूप बेल को स्थिर करती हैं, शुभकर्म के फल को विरस करती हैं, मन में मलिनता पैदा करती हैं, हृदय
सदासुखदासजी