
अरहंतसिद्धभत्ती गुरभत्ती सव्वासाहुभत्ती य ।
आसेविदा समग्गा विमला वरधम्मभत्ती य॥322॥
अर्हन्त सिद्ध आचार्य उपाध्याय और सर्वसाधु भक्ति ।
वैयावृत्ति करने से होती है श्रेष्ठ धर्म भक्ति॥322॥
अन्वयार्थ : अरहन्त भक्ति, सिद्ध भक्ति, आचार्य-उपाध्याय-सर्वसाधु भक्ति और निर्मल धर्म में भक्ति - ये संपूर्ण वैयावृत्त्य से होते हैं । जिसने रत्नत्रय के धारकों की वैयावृत्त्य की, उसने सभी धर्म के नायकों की भक्ति की ।
सदासुखदासजी