
संवगजणियकरणा णिस्सल्ला मन्दरुव्व णिक्कंपा ।
जस्स दढा जिणभत्ती तस्स भयं णत्थि संसारे॥323॥
भव-भय से उत्पन्न, मेरुवत् निश्चल और निःशल्य कही ।
उसे नहीं भवभय होता है जिसको है जिनवर भक्ती॥323॥
अन्वयार्थ : संसार-परिभ्रमण के भय से उत्पन्न हुई है प्रवृत्ति जिसके, मायाचार शल्य, मिथ्यात्वशल्य तथा भोग-वांछारूप निदानशल्य - इनसे रहित और मेरु की तरह निष्कम्प, निश्चल ऐसी जिनेन्द्र भगवान की जिसे दृढ भक्ति है, उसको संसार का भय नहीं है ।
सदासुखदासजी