
पंचमहव्वयगुत्तो णिग्गहिदकसायवेदणो दंतो ।
लब्भदि हु पत्तभूदो णाणासुदरयणणिधिभूदो॥324॥
महाव्रतों से गुप्त,1 कषाय वेदना विजयी रागजयी ।
नाना श्रुत-रत्नों की निधिमय पात्रलाभ दे वैयावृत्ति॥324॥
अन्वयार्थ : पंच महाव्रतों से युक्त और निग्रह की है कषाय वेदना जिसने, राग-द्वेष के दमन करनेवाले, अनेक श्रुतज्ञानरूप रत्नों के निधान ऐसे पात्र का लाभ वैयावृत्त्य के द्वारा ही होता है ।
सदासुखदासजी