
दंसणणाणे तव संजमे य संधाणदा कदा होइ ।
तो तेण सिद्धिमग्गे ठविदो अप्पा परो चेव॥325॥
दर्श-ज्ञान-तप-संयम में यदि लगें दोष तो होते दूर ।
सिद्धि मार्ग में निज-पर को उससे स्थापित करता शूर॥325॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष रत्नत्रय के धारक की वैयावृत्त्य करता है; वह दर्शन, ज्ञान, तप, संयम में अपने को जोडता/बाँधता है । इसप्रकार जोडने से अपने आत्मा को और पर जो अन्य साधु दोनों को निर्वाण के मार्ग में स्थापित किया ।
सदासुखदासजी