
वेज्जावच्चकरो पुण अणुत्तरं तवसमाधिमारूढो ।
पफ्फोडिंतो विहरदि बहुभवबाधाकरं कम्मं॥326॥
वैयावृत करनेवाले मुनि इस तप में होकर एकाग्र ।
भव-भव दुःखमय कर्म-निर्जरा करते-करते करें विहार॥326॥
अन्वयार्थ : वैयावृत्त्य करनेवाले साधु सर्वोत्कृष्ट तप में एकाग्रता को प्राप्त हुआ करते हैं । जो कर्म बहुत भवों में बाधा करनेवाला, उसका नाश करके प्रवर्तते हैं ।
सदासुखदासजी