+ अब वैयावृत्त्य से पूजा नामक गुण होता है, यह कहते हैं - -
जिणसिद्धसाहुधम्मा अणागदातीदवट्टमाणगदा ।
तिविहेण सुद्धमदिणा सव्वे अभिपूइया होंति॥327॥
भूत भविष्य वर्तमानगत जिनवर सिद्ध साधु अरु धर्म ।
शुद्ध चित्त से मन-वच-तन से अभिपूजित होते हैं सर्व॥327॥
अन्वयार्थ : जो शुद्धबुद्धि के धारक साधु, मुनियों की वैयावृत्त्य मन-वचन-काय से करते हैं, उन्होंने अनागत/भविष्य, अतीत और वर्तमान रूप तीनों काल के अरहंत, सिद्ध, साधु और धर्म सभी पूजे । इससे भगवान की आज्ञा वैयावृत्त्य करने की थी । जिन्होंने वैयावृत्त्य की, उन्होंने सम्पूर्ण धर्म का आदर किया ।

  सदासुखदासजी