साधुस्स धारणाए वि होइ तह चेव धारिओ संघो ।
साधू चेव ही संघो ण हु संघो साहूवदिरित्तो॥329॥
साधु धारणा से भी होता सकल संघ का अवधारण ।
साधु जनों को ही संघ जानो संघ साधु से भिन्न नहीं॥329॥
अन्वयार्थ : साधु के धारण से सर्वसंघ का धारण/स्वीकार होता है; अत: साधु ही संघ है, साधु से भिन्न संघ नहीं है । इसलिए जिसने साधु की वैयावृत्त्य करके साधु को रत्नत्रय में धारण किया, उसने सर्वसंघ को धारण/स्वीकार/प्राप्त किया ।

  सदासुखदासजी