गुणपरिणामादीहि अणुत्तरविहीहिं विहरमाणेण ।
जा सिद्धिसुहसमाधी सा वि य उवगूहिया होदि॥330॥
गुणपरिणामादिक उत्तम कायाब में जो नित रहे प्रवृत्त ।
हो एकाग्र सिद्धिसुख में वह, नहीं अन्यथा इनमें रत॥330॥
अन्वयार्थ : गुणपरिणाम, श्रद्धा, वात्सल्य, भक्ति, पात्र-लाभ, पूजा तथा तीर्थ की अव्युच्छित्ति इत्यादि सर्वोत्कृष्ट विधि से प्रवर्तने वाले जो साधु, उन्होंने निर्वाण सुख की एकता अंगीकार की । ये पूर्वोक्त गुणपरिणामादि निर्वाण के सुख में लीन होने के ही उपाय हैं, इन्हें अंगीकार किया ।

  सदासुखदासजी