
अदिसयदाणं दत्तं णिव्वीदिगिंच्छा य दरिसिदा होइ ।
पवयणपभावणा वि य णिव्वूढं संघकज्जं च॥332॥
अतिशय दान दिया, दर्शनगुण निर्विचिकित्सा भी होता ।
प्रवचन की प्रभावना भी की सकल संघ का कार्य किया॥332॥
अन्वयार्थ : जिन्होंने वैयावृत्त्य करके रत्नत्रय की रक्षा की, उन्होंने अतिशयरूप दान दिया । जिन्होंने वैयावृृत्त्य करके रत्नत्रय की रक्षा की, उन्होंने अतिशयरूप दान दिया । निर्विचिकित्सा नामक सम्यक्त्व का गुण प्रगट कर दिखा दिया और जिनेन्द्र के धर्म की तथा आगम की प्रभावना प्रगट की, संघ के कार्य का निर्वाह किया ।
सदासुखदासजी