
गुणपरिणामादीहिं य विज्जावच्चुज्जदो समज्जेदि ।
तित्थयरणामकम्मं तिलोयसंखोभयं पुण्णं॥333॥
वैयावृत्ति युक्त पुरुष गुण-परिणामादिक कायाब से ।
तीन लोक को अचरजकारी तीर्थंकर का पुण्य वरे॥333॥
अन्वयार्थ : वैयावृत्त्य युक्त पुरुष, वह गुण-परिणामादि का जो वर्णन किया, उनके द्वारा त्रैलोक्य में आनंद के कारणरूप ऐसे तीर्थंकर नामक पुण्यकर्म का संचय करता है ।
सदासुखदासजी