+ अब आगे आठ गाथाओं में आर्यिका की संगति के त्याग की शिक्षा देते हैं - -
वज्जेह अप्पमत्ता अज्जासंसग्गमग्गिविससरिसं ।
अज्जाणुचरो साधु लहदि अकित्तिं खु अचिरेण॥335॥
निष्प्रमाद हो अग्नि और विष-तुल्य आर्यिका-संग तजो ।
आर्या संग से दीर्घकाल तक मुनि अपयश का भागी हो॥335॥
अन्वयार्थ : भो मुने! अग्नि समान और विष समान जो आर्यिका की संगति, उसका सावधान होकर वर्जन करो । आर्यिका की संगति करनेवाला साधु शीघ्र ही अपकीर्ति को प्राप्त होता है ।

  सदासुखदासजी