
थेरस्स वि तवसिस्स वि बहुस्सुदस्स वि पमाणभूदस्स ।
अज्जासंसगग्गीए जणजंपणयं हवेज्जादि॥336॥
बहु श्रुतवन्त तथा तपसी हो प्रामाणिक या वृद्ध अहो ।
एेसा मुनि भी आर्या संग लोकापवाद का भागी हो॥336॥
अन्वयार्थ : वृद्ध हों तथा बडे कठिन अनशनादि तप के धारक हों और बहुत शास्त्रों के पारगामी हों, सर्व लोक में प्रामाणिक हों, ऐसे भी आर्यिका की संगति करने से लौकिक जनों से अपवाद को प्राप्त होते ही हैं ।
सदासुखदासजी