किं पुण तरुणो अबहुस्सुदोयअणुकिट्ठ
अज्जासंसग्गीए जणजंपणयं ण पावेज्ज॥337॥
तो फिर जो हैं तरुण, अल्पश्रुत और अनुत्कृष्ट तपसी ।
क्यों न आर्यिकाओं के संग से हों लोकापवाद भागी॥337॥
अन्वयार्थ : जो तरुण हो, बहुश्रुती नहीं हो, बहुत शास्त्रों को नहीं जानता हो, उत्कृष्ट तप भी नहीं करता हो, ऐसा साधु आर्यिका की संगति करके लोक में अपवाद नहीं पायेगा क्या? अवश्य ही अपवाद को प्राप्त होगा ।

  सदासुखदासजी